मित्र, भाई यॉ सम्बंधी – किससे धन लाभ होगा ?

1. धन भाव, लग्न भव, लाभ भाव आदि भाव धन के द्योतक । इन भावों से जिन सम्बंधियों आदि का घनिष्ठ (युति, दृष्टि आदि द्वारा) सम्बंध होता है उन सम्बंधियों से धन की प्राप्ति होती है यदि धनादि भावों से सम्बंध करने वाले गृह निर्बल ना हों । 

उदाहरणार्थ साथ की कु० सं० 1 में लाभ भाव का तथा चतुर्थ भाव का घनिष्ठ सम्बन्ध है क्योंकि लाभाधिपति बुध चतुर्थ भाव में आ पड़ा है और चतुर्थ भाव का स्वामी मंगल लाभ भाव को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है ।

कु० सं० 1

अतः ज्योतिष के नियमों के अनुसार कहा जा सकता है कि चतुर्थ भाव प्रदिष्ट भूमि आदि की प्राप्ति का संकेत मिल रहा है । यहाँ वाहन न लेकर भूमि आदि (Property) इसलिये कही है कि भूमिपुत्र भौम स्वयं चतुर्थ का स्वामी हो रहा है।

यदि शुक्र इस प्रकार चतुर्थेश होता तो हम अवश्य ‘वाहन’ की प्राप्ति कहते क्योंकि चतुर्थ भी वाहन और शुक्र भी वाहन है ।

उधर इस कुण्डली में बुध भी एक स्त्री ग्रह होने के कारण तथा एकादश स्थान का स्वामी होने के कारण बड़ी बहिन का प्रतिनिधित्व कर रहा है न कि बड़े भाई का । अतः अब हम समझ सकते हैं कि क्यों इस व्यक्ति को अपनी बड़ी बहिन द्वारा जायदाद (Property) की प्राप्ति हुई।

2. मान लीजिये कि किसी व्यक्ति की वृषभ लग्न है और मंगल तथा शुक्र दोनों पंचम भाव में स्थित हैं। ऐसे व्यक्ति को स्त्री पक्ष से अर्थात् अपने सुसराल से काफी धन आदि का लाभ अथवा सहायता रहेगी क्योंकि वृषभ लग्न वालों के लिये मंगल स्त्री भाव का स्वामी होता है और शुक्र उसी स्त्री भाव (सप्तम) का कारक । स्त्री पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले दोनों ग्रहों का लाभ भाव पर दृष्टि डालना स्त्री पक्ष द्वारा लाभ का द्योतक बन ही जावेगा ।

3. उपर्युक्त सिद्धान्त के अनुसार धनेश का व्यत्यय (Exchange) धन का तथा ‘व्यत्यय स्थान निर्दिष्ट सम्बन्धो का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध उत्पन्न करता है जिसके फलस्वरूप धन की प्राप्ति व्यत्यय के अन्य स्थान से होनी निश्चित हो जावेगी ।

उदाहरण के लिये यदि द्वितीय स्थान तथा पंचम स्थान में व्यत्यय हो अर्थात् द्वितीय भाव का स्वामी पचम में हो और पञ्चम का स्वामी द्वितीय में तो धन की प्राप्ति पुत्र द्वारा होगी । अर्थात् पुत्र धन कमा कर खिलावेगा ।

उदाहरणार्थ संलग्न कु. सं. 2 में सप्तमाधिपति मंगल तथा सप्तम भाब कारक शुक्र दोनों के लाभ भाव को देखने के कारण इस व्यक्ति को दो तीन बार प्रचुर धन की सहायता अपनी सास से हुई ।

कु० सं० 2

4. जब सिंह लग्न वालों का बुध बलवान् होगा उनको बड़ी बहिन से लाभ पहुँचेगा । इस लाभ का कारण द्वितीय भाव तथा एकादश भाव का एक ही स्वामी का होना तथा उसका बलवान् होना है।

तो दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब कोई भाव अथवा इसका स्वामी अतीव बली होता है तो उस भाव, उस सम्बन्धी आदि से लाभ होता है जिस सम्बन्धी आदि के भाव में ग्रह की दूसरी राशि पड़ी हो।

उदाहरण के लिए मेष लग्न वालों का शुक्र यदि खूब वलवान् हो तो द्वितीय भाव तथा सप्तम भाव का, जिनका कि शुक्र स्वामी है, फल विशेष रूप से प्रकट होगा। और ऐसा होने में कारण द्वितीय तथा सप्तम में घनिष्ठ सम्बन्ध समझा जावेगा । जैसा यहाँ हम कहेंगे कि व्यक्ति को धन (द्वितीय स्थान) की प्राप्ति स्त्री (सप्तभाव) से है ।

5. इस प्रकार कन्या लग्न हो तो शुक्र द्वितीय तथा नवम स्थानों का स्वामी बनता है। यदि शुक्र बलवान हो तो हम कह सकते हैं कि व्यक्ति को धन (द्वितीय भाव) पिता (नवम भाव) से प्राप्त होगा ।

6. तुला लग्न वालों का मंगल यदि बलवान हो तो उनको भी स्त्री पक्ष से कुछ लाभ रहेगा क्योंकि मंगल धन तथा स्त्री भाव का स्वामी है ।

7.  वृश्चिक लग्न वालों का गुरु द्वितीय तथा पुत्र स्थान का स्वामी यदि बली हो तो ऐसे व्यक्तियों को पुत्र द्वारा धन की प्राप्ति होती है क्योंकि धन तथा पंचम भाव का एक ही ग्रह स्वामी बन जाता है ।

8. धनु लग्न वालों का शनि यदि बलवान् हो तो उनको धन की प्राप्ति अपनी छोटी बहिन अथवा यदि शनि पर पुरुष प्रभाव हो तो छोटे भाई से होगी । कारण यह कि धन स्थान का स्वामी ही तीसरे स्थान का स्वामी है ।

9. मकर लग्न वाले प्रायः अपने पांव पर स्वयं खड़े होते हैं । उनको सम्बन्धियों की सहायता बहुत कम होती है। उनके धनाधिपति का लग्नेश होना धन को निज द्वारा प्राप्त होना जतलाता है ।

10. कुम्भ लग्न वालों का गुरु यदि बलवान् हो तो और लग्नों के अतिरिक्त उनको अपने बड़े भाई से भी लाभ रहता है क्योंकि धनेश का लाभेश होना लग्न स्थान (बड़े भाई) से धन की प्राप्ति बतलाता है ।

11. मीन लग्न वालों का मंगल यदि बलवान हो तो उनको छोटे माले अर्थात स्त्री के छोटे भाई द्वारा धन की प्राप्ति होती है क्योंकि धन का स्वामी नवमेश भी होता है और मंगल भी । नवमेश मंगल छोटा साला है ।

12. कहने का भाव यह है कि ज्योतिषी को चाहिए कि जब कोई ग्रह बलवान् हो तो लग्न का स्रोत देखने के लिए उन दो स्थानों के परस्पर सम्बन्ध को स्थापित करे जिनका कि वह बलवान् ग्रह स्वामी है ।

13. यदि मेष लग्न हो जोर मंगल पर्याप्त बली हो तो लग्न तथा अष्टम में घनिष्ट सम्बन्ध उत्पन्न हो जाता है जिसका अर्थ यह लगाना चाहिये कि जातक (Self) को अष्टम से लाभ है । अष्टम बनता है स्त्री भाव से दूसरा भाव अर्थात् स्त्री का धन स्थान अतः ऐसे व्यक्ति को अपनी स्त्री अपने उपार्जित अथवा संचित धन से सहायता करेगी ।

14. यदि वृषभ लग्न हो और शुक्र वलवान् हो तो लग्नेश का षष्ठ से सम्बन्ध हो जाने के कारण माता की बहिन आदि से लाभ रहेगा ।

15. यदि मिथुन लग्न हो और बुध बलवान् हो तो माता से धन प्राप्ति का योग समझना चाहिए क्योंकि लग्न तथा माता स्थान में बुध द्वारा घनिष्ठ सम्बन्ध उत्पन्न हो जावेगा

16. यदि कन्या लग्न हो तो लग्नेश बुध की दूसरी राशि दशम स्थान में पड़ती है अतः ऐसे व्यक्ति को पिता के धन (नवम से द्वितीय) का लाभ रहेगा ।

17. यदि तुला लग्न हो तो लग्नेश अष्टम भाव का स्वामी बनता है । यदि शुक्र बली हो तो स्त्री संचित धन द्वारा सहायता करे क्योंकि अष्टम भाव भी स्त्री का धन है ।

18. यदि वृश्चिक लग्न हो तो लग्नेश मंगल षष्ठ स्थान का भी स्वामी बनता है । मंगल यदि बलवान् हो तो माता के छोटे भाई से लाभ रहता है, शत्रु तथा चोर तक सहायता करते हैं ।

19. यदि धनु लग्न हो और गुरु बलवान् हो तो माता तथा छोटे भाइयों से धन का लाभ रहे। क्योंकि गुरु माता का लग्नेश तथा छोटे भाई (तृतीय स्थान) का धनेश बनता है ।

20. यदि मकर लग्न हो और शनि बलवान् हो तो मनुष्य को माता से लाभ रहता है क्योंकि द्वितीय स्थान माता का लाभ स्थान है। अधिकतर लाभ ऐसे व्यक्ति को अपने ही पुरुषार्थ से रहता है ।

21. यदि कुम्भ लग्न हो तो पिता की माता दादी से लाभ हो पर शनि बलवान् होना चाहिए। क्योंकि ऐसी दशा से शनि जहाँ निज (Self ) का प्रतिनिधि बनता है वहाँ वह पिता (नवम से चतुर्थ (अर्थात् द्वादश) का भी स्वामी बनता है । नवम से चतुर्थ पिता की माता का स्थान है ।

22. यदि मीन लग्न हो तो मनुष्य को पिता के धन का लाभ गुरु के प्रबल होने की दशा में मिलता है क्योंकि गुरु लग्न तथा दशम अर्थात् निज (Self) तथा पिता के धन (नवम से द्वितीय) का प्रतिनिधि होता है और लग्न तथा दशम में आधिपत्य द्वारा घनिप्ट संबन्ध होता है ।

23. इस सन्दर्भ में इतना याद रहे कि कोई भी ग्रह जब निज राशि को देखता है और वह राशि अथवा वह ग्रह अथवा उस ग्रह की अन्य राशि भी शुभ युक्त अथवा शुभ दृष्ट हो तो उस ग्रह को भी बली समझा जावेगा और उस ग्रह की दोनों राशियों के बीच में सबन्ध स्थापित हुआ समझा जावेगा ।

उदाहरण के लिए मेष लग्न हो और मंगल कन्या राशि का होकर छठे में पड़ा हो और (i) मेष लग्न (ii) मंगल अथवा (iii) वृश्चिक राशि – इन तीनों में से एक पर भी किसी शुभ ग्रह का युति अथवा दृष्टि द्वारा प्रभाव हो तो मंगल बलवान् समझा जावेगा तथा लग्न एवं अष्टम भाव में संबन्ध स्थापित हुआ समझा जावेगा जिसके फल स्वरूप हम कह सकेंगे कि इस व्यक्ति को अष्टम भाव संबन्धित व्यक्तियों अथवा वस्तुओं से (स्त्री के धन) लाभ रहेगा ।

लाटरी तथा भूमि में गड़े धन की प्राप्ति के योग

लाटरी तथा भूमि में गड़े धन आदि के प्रश्न का उत्तर सबके लिये रुचिकर होगा । अचानक घटनाओं के लिए ग्रहों में जो सबसे अधिक विख्यात हैं वे हैं राहु तथा केतु । ये ग्रह “क्रान्ति” Revolution), दंगे, फसाद (Riots), आदि अचानक घटनाओं के कारक हैं।

बुध भी अपनी भुक्ति के “आरम्भ’ में ही फल दे देता है इसका नाम “कुमार” भी है अतः यह भी अचानक फल देता है बल्कि बुध को “सद्यः प्रतापी” कहा है।

उधर भावों में नवम तथा पंचम भाव “भाग्य” अथवा “किस्मत” से संबन्ध रखते हैं। जब हम को किसी ऐसे इष्ट अथवा अनिष्ट की प्राप्ति होती है जिसको हमने बहुत कम अपने विचार में लाया हो तो हम कहते हैं कि इसमें तो “भाग्य” का हाथ है ।

निष्कर्ष यह कि नवम तथा पंचम भाव तथा राहु केतु ग्रह अचानक धन का योग बनाने में बहुत उपयुक्त है । यही कारण है कि सट्टा आदि भविष्य संबन्धी कार्य भी पंचम भाव से देखे जाते हैं ।

जब किसी कुण्डली में राहु नवम अथवा पंचम पड़ा हो और नवम अथवा पंचम का स्वामी बुध अथवा कोई अन्य शुभ ग्रह होकर स्थिति तथा दृष्टि द्वारा बलवान् हो तो राहु तथा पंचमेश अथवा नवमेश अपनी दशा अन्तर्दशा में अचानक धन का लाभ देते हैं । ऐसे ग्रह अचानक उन्नति (Unexpected Promotion) लाटरी-ग्रेड (Grade) का मिलना आदि देवीकृपा के कार्य करवा देते हैं ।

आगे की कु० सं० 3 वाले जातक को गुरु की महादशा तथा बुध की भुक्ति में रु 1000000 की लाटरी निकली । यह कुण्डली अचानक धन प्राप्ति का एक अच्छा उदाहरण है। गुरु दो लग्नों (लग्न तथा सूर्य लग्न) से नवमेश होता हुआ लाभ स्थान में है । पुनः तीसरी लग्न चन्द्र के साथ प्राप्ति के स्थान में जा बैठा है और वह चन्द्र (लग्न) भी लग्नेश तथा सूर्य लग्नेश है ।

कु० सं० 3

अर्थात् भाग्येश गुरु का पूर्ण संबन्ध सब की सब लग्नों से आय स्थान में हुआ है। जिसका स्पष्ट अर्थ यह है कि गुरु अपनी दशा में भाग्य द्वारा अथवा देव योग से लाभ पहुँचा सकता है ।

अब लीजिये वुध को बुध का आधिपत्य यद्यपि दो अशुभ स्थानों तृतीय तथा द्वादश का है परन्तु हमें यह बात भूल जानी चाहिये क्योंकि वुध की मिथुन है राशि में मंगल केतु विराज मान हैं और मंगल दो लग्नों (लग्न तथा सूर्य लग्न) से योग कारक बनता है । अतः वुध, मंगल योगकारक का फल देगा और देगा भी अचानक क्योंकि मंगल के साथ केतु है और बुध स्वयं भी अचानक शीघ्र फल देने वाला है ।

मंगल दो लग्नों से पंचमेश है और बुध तीसरी चन्द्रलग्न से पंचमेश है अतः लाटरी (पंचम भाव) द्वारा धन प्राप्ति वुध की भुक्ति में सिद्ध होती है।

यदि नवम भाव में वुध की राशि हो और उस में राहु अथवा केतु हो और लग्न में सूर्य अथवा चन्द्र अथवा दोनों हों और बुध शुभ भाव में बलवान् हो तो अचानक पदोन्नति, अचानक राज्य कृपा, अचानक धन प्राप्ति का योग वन जाता है ।

25. (i) अचानक धन, जैसे लाटरी तथा भूमि में गड़े धन आदि से मिलने वाले धन की प्राप्ति का विचार पंचम स्थान से होता है यदि पंचम स्थान में चन्द्रमा स्थित हो और उस पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक को लाटरी इत्यादि से अचानक धन मिलता है ।

(ii) यदि द्वितीयेश और चतुर्थेश शुभ ग्रह के साथ नवम भाव शुभ राशिगत होकर स्थित हों तो जातक को भूमि में गड़ी हुई सम्पत्ति मिलती है।

(iii) इसी प्रकार यदि एकादशेश और द्वितीयेश चतुर्थगत हों, चतुर्थेश शुभ ग्रह के साथ हो और शुभ राशिगत हो तो भी जातक को भूमि में गड़ी हुई सम्पत्ति का लाभ होगा ।

(iv) पुनः यदि एकादशेश चतुर्थ स्थान में हो और शुभ ग्रहसे युत हो तो भी वैसा ही फल होता है। ध्यान रहे कि चतुर्थ स्थान को पाताल स्थान कहते हैं अर्थात् भूमि में गड़ी हुई वस्तुओं का बोध कराता है।

उपर्युक्त तीन योगों में चतुथश का धन स्थान और भाग्य स्थान अथवा आय स्थान से सन्बन्ध दिखलाया गया है। अतः यह रहस्य स्मरण रखने योग्य है ।

व्यवसाय का चुनाव और आर्थिक स्थिति

  1. कुण्डली की वैज्ञानिक व्याख्या
  2. ग्रहों का व्यवसाय पर प्रभाव
  3. पाराशरीय धनदायक योग 
  4. लग्नो के विशेष धनादायक ग्रह
  5. धन प्राप्ति में लग्न का महत्त्व 
  6. विपरीत राजयोग से असाधारण धन
  7. नीचता भंग राजयोग
  8. अधियोग से धनप्रप्ति
  9. स्वामिदृष्ट भाव से धनप्रप्ति
  10. कारकाख्ययोग से धनप्रप्ति
  11. सुदर्शन तथा धनबाहुल्य
  12. शुक्र और धन 
  13. जातक का व्यवसाय
  14. मित्र, भाई यॉ सम्बंधी – किससे धन लाभ होगा ?
  15. धन कब मिलेगा ?
  16. व्यव्साय चुनने की पध्दति
  17. धन हानि योग


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